मास्टरजी और कलम

आज कल कलम पकड़ कर मैं भी बैठ जाता हूँ

सोचता हूँ अपनी ज़िंदगी को कागज़ पे उतार दूंगा

अपना किस्सा दादाजी के चाय से शुरू करूँ या उनकी घड़ी से

यह नही तय कर पा रहा

पर मेरी दादी ज़रूर होंगी उसमें

घर को एक दम साफ़ रखने के कोशिश में 

सुबह से शाम तक बस एक कपड़ा हाथ में लिए…

कभी इस कोने कभी उस..

सुना है कि दिल का रास्ता पेट से होके जाता है

शायद इसलिए माँ इतना अच्छा खाना बनाती थी

पापा भी कभी कभी बनाते थे

वो बस खाने लायक ही होता था

अपने भाई के बारे में क्या लिखूं यह भी एक बड़ा सवाल है

अपनी समझदारी या उसकी नादानियां
खैर जो भी लिखूंगा होंगी अपने ही बचपन के कहानियां

मेरे इस बचपन में एक स्कूल भी था

जहाँ हमारे मास्टर जी पूरा दिन

Mid Day Meal की व्यवस्था में व्यस्त रहते थे

खाना बड़ा अच्छा होता था क्योंकि वो सब याद रखते थे..

कितने आलू, कितने मसाले, कितना पानी
सब।


बस एक कलम चलाने की व्यवस्था करनी भूल गए ।।

आज कल कलम पकड़ कर मैं भी बैठ जाता हूँ

सोचता हूँ अपनी ज़िंदगी को कागज़ पे उतार दूंगा।।

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